Friday, November 23, 2012

टाफी खाने की उम्र में गोली हम भी खाकर देखे-मोनू वशिष्ठ

आओ जरा एक बार हाँ खुद को,
इस जगह पर रखकर देखें ,
टाफी खाने की उम्र में ,
गाली हम भी खा कर देखें ,
क्या कहती ये मासूम सी आँखें ,
एक दुनिया इसकी नज़र से देखें ,
क्यूँ कालिक सी है चेहरे पर,
हम भी तो यूँ सजकर देखें,
क्या ऐसा ही था अपना बचपन ,
ये बचपन भी जीकर देखें ,
कहाँ हसी खो गई इस चेहरे की,
हम भी तो जरा खोकर देखें,
कैसे थककर सोती ये आँखें ,
हम भी तो यूँ थककर देखें ,
एक बार ज़रा अपने बच्चे को,
इस तस्वीर में रखकर देखें ......
--- मोनू वशिष्ठ

देश की वरबादी का कारण है भारत के सेकुलर लोग क्योकि आजकल जयचन्दो की फौज ज्यादा पैदा हो गयी है।

 मौनिका शाह एक ऐसा नाम जिन्हौने पूछा है भारत की सैकूलर सरकार व सैकूलर पिठ्ठुओं से प्रश्न कि ये लोग इन बातों का उत्तर दें।
जब भी इस दुनिया की सब से नपुंसक कौम का इतिहास पढाया जायेगा.... और जब भी इस दुनिया में किसी की नामर्दी के चुटकुले सुनाये जायेंगे.. तो उसमें हमारे देश के  सेकुलरो का नाम सबसे आगे होगा। इस दुनिया के 99 % मुसलमान चीख चीख कर कहते हैं कि वो सेकुलर नाम के कोढ़ी नहीं है और उनका इस्लाम सब से महान है। सिर्फ इतना ही नहीं.... इसी दुनिया के 99 % ईसाई डंके की चोट पर कहने को तैयार हैं कि वो सेकुलर नहीं हैं और, ईसाई ही दुनिया के राजा हैं।लेकिन फिर भी उसी दुनिया में 99 % हिन्दू ये कहते हैं कि वो सेकुलर हैँ और सब धर्म समान हैं... वाह रे सेकुलर हिन्दू ... .....वो तो शुक्र मनाओ... और, समझ लो कि ये पुण्य है तुम्हारे पूर्वज दुर्गा,काली,राम,कृष्ण,शंकर,राजा भरत,भीष्म पितामह,कर्ण,प्रथ्वीराज,बाप्पा रावल, राणा प्रताप,शिवा जी, रानी लक्ष्मीबाई,बासुदेव वलबंत फड़के,नाना जी मंगल पाण्डेय,मदन लाल धीगरा,सुभाष चन्द्र बोस,स्वामी दयानन्द,स्वामी विवेकानन्द और न जाने कितने अनगिनित वीर रहैं है उनके सत्कर्म तुम्हारे साथ है और भला मानो कि 1925 में पैदा हुआ राष्ट्रीय विचारों का पोषक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ,हिन्दु महासभा औऱ बाला सहाब ठाकरे जैसे जाबांज का संगठन शिवसेना औऱ वर्तमान समय में दुर्गा रुपी साध्वी प्रज्ञा और राम रुपी कर्नल पुरोहित जैसे जाबांजों का वरना, अब तक तुम्हारी मूछों की शान मानी जाने वाली तुम्हारे घर की औरतें लश्कर ऐ तोइबा के अड्डों पर मुजरा कर रही होती और तुम उसमे तबला बजा रहे होते...पूरी दुनिया के सामने टी वी में लाइव लोगों की लाशें बिछाता अजमल कसाब जिस के लिए किसी भी सबूत की कोई जरूरत नहीं है.. जिस का सबूत देश का हर वो नागरिक है जिस के घर में टी वी है.. पर, वो जेल में बिरयानी खा कर उसके बचे टुकड़े तुम हिन्दुवों के मुँह पर फेंक रहा है.. और.... वही दूसरी तरफ हमारी देवी प्रज्ञा जिस का 4 बार नार्को टेस्ट हुआ और वो हर बार निर्दोष पायी गयी.... इस पूरे हिन्दुस्तान में एक भी गवाह या सबूत नहीं उसके खिलाफ . फिर भी वो आज जेल में अपनी जिंदगी की आखिरी सांस ले रही है.... जानते हो.... ऐसा क्यों है ...????? .. क्यों कि .. तुम नामर्द हो... जिस अफज़ल गुरु ने देश के ह्रदय... संसद पर हमला किया और, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2 बार फांसी पर चढ़ा देने का आदेश दिया ..! पर, आज तक वो अपनी वो जिंदगी 5 स्टार तिहाड़ में बिता रहा है ...जो उनसे अपनी कमाई पर कभी सोची भी नहीं थी.... पर, वही दूसरी तरफ हमारे कर्नल पुरोहित जिस को सेना ने भी साफ़ क्लीन चिट दे दी है उनको जेल में रख कर हर पल मौत दी जा रही है... क्योंकि तुम नामर्द हो.. कश्मीर में शायद ही कोई दिन हो जब किसी हिन्दू का सर ना काटा जाता हो ....पर, उमर अब्दुल्ला या फारुख अब्दुल्ला मुर्दाबाद का नारा तो दूर कोई हिन्दू उनका नाम भी नहीं जानता होगा... लेकिन... गुजरात के नरेन्द्र मोदी मुर्दाबाद का नारा मुस्लिम बच्चों को पेट से सिखा कर पैदा किया जा रहा है.... क्योंकि तुम नामर्द हो....जिस देश में 80 % से भी ज्यादा हिन्दू रहते हों... उसी हिन्दुओं के देश में हिन्दुओं के अराध्य भगवान राम की जन्मभूमि पर एक मंदिर तक नहीं बना पाए और उसके लिए भी मुस्लिम की रजामंदी का इंतज़ार है............क्या पिग्गिस्तान या अरब देश में मुस्लिम अपने मुहम्मद के किसी प्रतीक चिन्ह को विवादित मानने को तैयार होते....???? ऐसा इस देश में इसीलिए हो पाता है...क्योंकि ... तुम नामर्द हो...जिस देश का बहुसंख्यक हिन्दू हो...... वहां उनके अराध्य और राम सेतु को काल्पनिक बताया जाए ..ऐसा कभी हो सकता है....?? लेकिन.. इस देश में ऐसा ही होता है.....क्योंकि तुम नामर्द हो...जिस देश के बहुसंख्यक हिन्दू हो..... और एम् .एम् हुसैन जैसा आदमी ... वहां के बहुसंख्यक समाज के अराध्य देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बना कर भी.... सरकार द्वारा सम्मानित होता हो..... वो इन नपुंसक सेकुलरों की बजह से ही संभव है..! जो भी सेकुलर ... अपने आप को मर्द मानता हो वो आ कर इसका जवाब दे... मैं आज खुली चुनौती दे रही हूँ भारत के हर हिन्दू सेकुलर को................... या तो... खुद को हिंजड़ा और मुस्लिमों की नाजायज औलाद मान ले........... या इस पोस्ट का जबाब दे..........
       यह केवल मेरा नही हर भारतीय के विचार है ये भी मैने 
मौनिका शाह के फेसवुक एकाउण्ट से लिए हैं।                                                    जय श्री राम

भारत सरकार अपना विश्वास खो चुकी है।कांग्रेस जबाव दे कि तुमने अचानक फांसी क्यो दी किसका डर था तुम्है ये डर था या तुष्टीकरण

फेसबुक मयूर के सभी '' मयूरपंखो '' को अमित तेवतिया '' निःशब्द '' की तरफ से वन्देमातरम
क्या कपड़े बदल लेने से इंसान की सीरत बदल जाती हैं ?
क्या रोटी बदल लेने से पेट की भूख बदल जाती हैं ?
क्या गुल को गुलशन से बदल लेने पर गुल की महक बदल जाती हैं ?
क्या बारिश की बूंद बदल लेने से प्यास बदल जाती हैं ?
सवाल कई हैं जिनमे अपवाद भी कई मिल जायेंगे मगर जो खरा हैं वों खरा ही रहता हैं,,सोने चांदी की तरह हीरा भी जितना ही पुराना हो ,उतना ही कीमती होता हैं,, मगर यदि पत्थर पुराना हो तो उसमे काई लग जाती हैं,,कहने को तो हीरा स्वयं एक पत्थर हैं मगर कुछ पत्थर चमकदार होते हैं..जो गले से लग जाए तो आपकी शान बढा दे और गले से नीचे उतर जाए तो आपको '' निःशब्द '' कर दे ...सदा के लिए .....
आजकल न्यूज चैनल पर कोई भी डिबेट चल रही हो ,,एड टाइम में कोई कांग्रेस की एजेन्ट '' चूसलिका '' आती हैं और मोदी जी के किये गए विकास कार्य की और ऊँगली क्या पूरी टांग उठाती हुयी नजर आती हैं (माता बहिने माफ करे) और भाड़े के टटुओ की जेब में अट्ठन्नी चवन्नी डालकर उनसे मोदी जी के विकास कार्यों की बुराई करवाती हैं,,अपना बाया हाथ नचा नचा कर गुजरात की दशा को ऐसे प्रदर्शित करती हैं जैसे गुजरात ना जाने कब से पिछड़ा हुआ हैं,,तो मेरा उस चुसलिका से अहम सवाल यह हैं कि वों अब तक क्यों सो रही थी ? क्या अब तक गुजरात के रास्ते बंद थे या बस - ट्रेन की हड़ताल थी जो यह अब चुनाव के वक्त वहाँ अपनी सहानुभूति प्रकट करने गयी ?
कल चपरासी से ग्रहमंत्री बना शिंदे मोदी जी को हर बात में राजनीति करने वाला कह रहा था ? तो मैं बताना चाहूँगा कि यह सभी नीच मीडिया एक एक ठलुए मंत्री के पास ..एक एक रेहडी खोमचे वाले के पास ,, गली के हर सूअर के पास कसाब की फाँसी की प्रतिक्रिया जानने पहुची मगर कोई भी मोदी जी के पास नही पहुचा ? जबकि मोदी जी ने सिर्फ ट्विटर पर इतना ट्विट किया था कि '' वाट एबाउट अफजल गुरु '' ... और इसी को सभी कांग्रेसी राजनीति कहने लगे .. जो रायबरेली सोनिया गाँधी का सिंघगढ़ कहा जाता था ,,इस बार वहाँ की जनता ने खुद सोनिया गाँधी के खिलाफ नारेबाजी की और पत्थर बरसाए ...
कल कल कसाब कसाब हो रहा है और सभी जानते हैं कि कसाब डेंगू से मरा हैं,,और कांग्रेस अपनी फजीहत से बचने के लिए उसे फाँसी की बात कर रही हैं..शिंदे कह रहा हैं कि सोनिया और प्रधानमंत्री को इस विषय में नही मालूम ..तो शिंदे साहब आप जरूर चपड़ासी से ग्रहमंत्री अपने पिछवाडा रगड़वाते हुए पहुच गए मगर यहाँ भारत की शिक्षित जनता आपकी तरह इतनी बेवकूफ नही कि आपकी चाल भी ना समज सके ..बिना सोनिया गाँधी की इजाजत के बगैर तो कोई भी कांग्रेसी मूत भी नही सकता और यह तो सीधे सीधे दामाद बाबू की फाँसी का सवाल हैं..कम से कम दिग्विजयसिंह के आँसुओ का ही ख्याल कर लेते ? खैर आपके पास सत्ता भी हैं और अपने मौलिक अधिकार भी ...आप मुझ पर ६६अ के तहत मुकदमा कायम करवाईये ..यकीन मानिए मैंने यह बयान पूरे होशो हवास में और स्वस्थ इन्द्रियों के चलते लिखा हैं जो कोर्ट में मेरे विरुद्ध और भी ज्यादा पक्के सबूत के तौर पर आप दिखा सकेंगे ... थू हैं तुम पर
साथियों २००७ में मोदी जी ११७ सीटे ही जीत पाए थे मगर अब यह आंकड़ा हमे १६० तक का चाहिए ..एक अनुमान के अनुसार छ करोड की आबादी वाले गुजरात में पोने चार करोड से ऊपर मतदाता हैं जिसमे सोलह प्रतिशत आदिवासी ,पन्द्रह प्रतिशत पटेल ,, दस प्रतिशत मुस्लिम ,, सात प्रतिशत दलित ,, ब्राह्मण ,जैन व अन्य आठ प्रतिशत ,, तथा अन्य पिछड़ा वर्ग चौवालीस प्रतिशत हैं..और सबसे बड़ी बात यह हैं कि जब सोनिया गाँधी अपने रायबरेली और अमेठी में ही अपनी भद पिटवा आई ,,वही मोदी जी का डंका पूरा भारत नही ,,अपितु पूरा विश्व बजा रहा हैं.....गुजरात के मुसलमान भाई भी मोदी जी के नेतृत्व को ही अपने हित में मानते हैं ,, ये अलहदा बात हैं कि कांग्रेस का मूठ वाडिया जब तब उन्हें कागजी महात्मागांधी के असर से विचलित करवाता रहता हैं...जो अब वों भी मुमकिन नही
इसलिए मैं तो यही कहूँगा कि जो कांग्रेस ६५ साल से कुछ ना कर पायी वों मोदी जी के दस साल के शासन ने कर दिखाया , गुजरात में पिछले एक दशक से नौ प्रतिशत वर्द्धि की दर से विकास हुआ इसलिए मोदी जी ने दिशा भी बदली और दशा भी बदली मगर अब हमे पूरा भारत बदलना हैं.....मैंने सरबजीत की फाँसी की आशंका कल ही जाहिर कर दी थी और अब इस बात के संकेत भी मिलने लगे हैं,,सरबजीत २०१४ तक अगर जीवित रह गया तो पाकिस्तान खुद उसे अपनी जालीदार टोपी में रखकर भारत सराकर को सौपेगा ,,ऐसा मेरा विश्वास हैं..मेरी दवाई का वक्त हो गया हैं और आपका आपकी आलोचना का ..तो कॉमंट बोक्स खुला हैं..मैं तो '' निःशब्द '' हूँ ,,इसलिए '' निःशब्द '' ही ठीक . शेयर करने वालो का सदा की तरह आभार और कोई भी कॉपी पेस्ट करे तो धारा ६६अ याद रखे ..मुझे तो मरने और मारने का जूनून सवार हैं,,आप सोच समझकर कदम उठाना ....

वंदेमातरम
अमित तेवतिया '' निःशब्द ''

Thursday, November 22, 2012

कसाव की कहानी देविका की जुवानी-शावास देविका हमें तुम पर गर्व है

देविका वह लड़की है जिसने कसाब को गोली चलाते हुये देखा था और वैखोफ होकर उस दरिंदे को पहिचाना भी था।और जब उसे फाँसी लग चुकी है तो बहुत खुश है।पिता नटवरलाल के साथ हम उनके सभी परिवार बालों को बधाईयाँ देते हैं कि उन्हैं देविका के रुप में साक्षात दुर्गा ही मिल गयी हैं।प्रभु से हमारी प्रार्थना है कि उनकी मनोकामना जो आई. ए.ऐस. अधिकारी बनने की है तो उसे पूरा करें।देश के किसी अच्छे इंस्टीट्यूट को उनका इस पढ़ाई के लिए सहयोग करना चाहिये जिससे उस इन्सटीट्यूट को व उनको दोनो को लाभ होगा व शायद एक देशभक्त आई.ए. ऐस. अधिकारी भी भारत को मिल पाएगा।
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मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकवादी हमले के गुनाहगार अजमल आमिर कसाब को गोली चलाते देखने वाली चश्मदीद गवाह देविका का कहना है कि वह आईपीएस अफसर बनकर हजारों आतंकवादियों को मारना चाहती है।

राजस्थान के पाली जिले की सुमेरपुर की रहने वाली कक्षा नौ की बच्ची देविका ने कहा कि मुझे राजस्थान की होने का गर्व है। जब मैं आतंकवादी हमले वाले दिन, जिस समय कसाब गोलियां चला रहा था, मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन आज जब कसाब को फांसी मिल गई है तो मुझे बहुत खुशी हो रही है।

देविका ने कहा कि मैं पढ़कर लिखकर आईपीएस अफसर बनना चाहती हूं, सरकार ने कसाब को फांसी देने में चार साल लगा दिये लेकिन उसे उसकी सजा मिली। मैं चाहती हूं कि सरकार संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू को जल्दी से जल्दी फांसी दें। कसाब को फांसी मिलने के बाद मुझे बहुत खुशी हो रही है।

देविका ने उस दिन के दुखद घटनाचक्र को याद करते हुए कहा कि मैं, पिताजी, बड़े भाई के साथ भाई से मिलने के लिए सीएसटी रेलवे स्टेशन से पुना जाने वाली थी। अचानक मैंने देखा कसाब सामने से गोलियां चला रहा था। चारों और लोग गिर रहे थे खून बह रहा था। अचानक एक गोली मेरे पांव में लगी और मैं गिर गई।

देविका ने कहा कि मुझे फिर पता नहीं लगा ,पुलिस वालों ने मुझे अस्पताल पहुंचाया और फिर होश आया तो एक पांव में जोरों से दर्द हो रहा था।

उन्होंने कहा कि मैंने अदालत में कसाब को पहचाना और कहा कि कसाब को गोली चलाते हुए देखा हैं। मुझे गवाही देने में कोई डर नहीं लगा।

देविका से जब पुछा गया कि घर की हालत को देखते हुए आईपीएस की पढाई कैसे करोगी उसने कुछ सोचकर कहा मैं पढूंगी जब उससे पूछा गया कि सरकार ने कुछ मदद की ,उसने कहा नहीं।

इधर देविका के पिता नटवर लाल और बड़े भाई जयेश (17) ने कहा कि आज कसाब को फांसी देने से मुझे बहुत खुशी हो रही हैं, मुंबई आतंकवादी हमले में मारे गये शहीदों की आत्मा को शान्ति मिली है। कसाब को फांसी मिलने के बाद मुझे, देविका और सभी को शांति मिली है।

नटवर लाल ने कहा कि मैं हमले वाले दिन को कभी नहीं भूल सकता, सीएसटी रेलवे स्टेशन पर खड़ा था, अचानक गोलियां चली ,एक गोली देविका के पांव में लगी और वह गिर गई। मैंने समझा देविका मर गई और मैं विचलित हो गया। देविका को अस्पताल ले जाया गया जहां मालूम हुआ कि वह जिंदा हैं।

नटवर लाल ने कहा कि वो पल याद कर आज भी मैं कांप जाता हूं लेकिन मुझे खुशी है कि कसाब को उसके गुनाह की सजा मिल गई है।

देविका के भाई जयेश ने कहा कि पिताजी को बहुत दिक्कतों का सामना करना पड रहा हैं। देविका को पहले कोई स्कूल प्रवेश देने को तैयार नहीं था लेकिन बाद में मुश्किल से उसे दाखिला मिला। वो पढ़-लिखकर आईपीएस अधिकारी बनना चाहती है। (भाषा)

वैलिंग वाल व इस्लामी जन्नत की हकीकत


वैलिंग वाल या इजराइल वाल पश्चिमी दीवार भी कहा जाता है।यह दीवार एक महान यहूदी मंदिर का ध्वंसावसेस है या उस मंदिर के आँगन की बाहरी दीवार है।यह जमीन से करीव 62 फीट ऊचे स्थान पर पत्थरों से बनी है।यह स्थान आज भी यहूदियों का पवित्र स्यान है। और लगभग हजारो लोग प्रति वर्ष यहाँ इसे देखने पहुँचते हैं।इस स्थान की सत्यता के बारे में आज भी  मुस्लिमों व यहूदियों के बीच बहुत से मतभेद रखता है।मुस्लिम इसे अपनी पुरानी मस्जिद का हिस्सा मानते हैं औऱ कहते हैं कि सातवी सदी के पैगम्वर मौहम्मद ने अपनी रात्रि यात्राओं में इसका वर्णन किया है। 
यहूदी व अन्य लोगों के अनुसार यह दीवार उस यहूदी मंदिर की दीवार है जिसे दूसरा यहूदी मंदिर कहा जाता है तथा  किंग हैरोड नेलगभग ईसा से 19 वर्ष पूर्व में जीर्णोद्धार करने की आज्ञा दी थी और यह कार्य लगभग 50 वर्षों में पूरा हुआ।और पूरा होने के लगभग कुछ ही समय बाद (ईसा के लगभग 70 वर्षों बाद) इसे रोमनों ने नष्टभ्रष्ट कर दिया था। और इसी मंदिर का यह हिस्सा आज भी अपना सिर ऊँचा किये रोमनों व इस्लामिक उग्रवादियों के वदसलूकी के कारनामों को अपने दिल में समाये यू ही खड़ा है ठीक उसी प्रकार जैसे भारत में भगवान विश्वनाथ का मंदिर इस्लामी आक्रांता औरंगजैव के वाराणसी विध्वंस की गाथाऐं अपने दिल में सजोंऐ आज भी अविचल खड़ा है।चित्र देखने के लिए यहाँ क्लिक करें।http://images.wisegeek.com/man-praying-at-the-wailing-wall.jpg
आपको मालूम है कि जन्नत की हकीकत क्या है ?
विश्व के लगभग सभी धर्मों में स्वर्ग और नर्क के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है.इन में सभी धर्मों की बातों में काफी समानता पायी जाती है.
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लेकिन स्वर्ग या जन्नत के बारे में जो बातें लिखी गयी हैं वह सिर्फ पुरुषों को रिझाने वाली बातें लिखी गयी हैं.जैसे मरने के बाद जन्नत में खूबसूरत जवान हूरें मिलेंगी ,जो कभी बूढ़ी नहीं होंगी .उनकी उम्र हमेशा १४-१५ साल की रहेगी.जन्नत वाले किसी भी हूर से शारीरिक सम्बन्ध बना सकेंगे.कुरआन में एक और ख़ास बात बतायी गयी है कि जन्नत में हूरों के अलावा सुन्दर लडके भी होंगे ,जिन्हें गिलमा कहा गया है .
शायद ऐसा इसलिए कहा गया होगा कि अरब और ईरान में समलैंगिक सेक्स आम बात है. आज भी पाकिस्तान में पुरुष वेश्यावृत्ति होती है .
इसलिए अक्सर जन्नत के मजे लूटने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.लोगों ने जन्नत के लालच में दुनिया को जहन्नुम बना रखा है .इस जन्नत के लालच और जहन्नुम का डर दिखा कर सभी धर्म गुरुओं की दुकानें चल रही हैं .भोले भाले लोग जन्नत के लालच में मरने मारने को तैयार हो जाते हैं ,यहाँ तक खुद आत्मघाती बम भी बन जाते हैं।
पहिले शुरुआती दौर में तो मुसलमान हमलावर लोगों को तलवार के जोर पर मुसलमान बनाते थे.लेकिन जब खुद मुसलाम्मानों में आपस में युद्ध होने लगे तो मुसलमानों के एक गिरोह इस्माइली लोगों ने नया रास्ता अख्तियार किया।जिस से बिना खून खराबे के आसानी से आसपास के लोगोंको मुसलमान बनाया जा सके।
पैगंबर मौहम्मद सहाव के बाद जब सत्ता हसन के हाथों में आ गयी तो उसने इस्लाम को नयी ऊचाई प्रदान करने के लिए नये नये कारनामें करना शुरु कर दिया जिसमें कुरान में वर्णित जन्नत का आन्नद जमीन पर ही  लेने और लोगों को अपने सम्प्रदाय इस्लाम में शामिल करने के लिए वह कोई युद्ध न करके अपनी शक्ति वढ़ाना चाहता था इसके लिए यह जन्नत बाला फार्मूला उसे कारगर लगा
          नाजिरी इस्मायीलिओं के मुजाहिद और धर्म गुरु "हसन बिन सब्बाह "सन-१०९०--११२४ ने जब मिस्र में अपनी धार्मिक शिक्षा पुरी कर ली तो वह सन १०८१ में इरान के इस्फ़हान शहर चला गया .और ईरान के कजवीन प्रान्त में प्रचार करने लगा.वहां एक किला था जिसे अलामुंत कहा जाता है.यह किला तेहरान से १०० कि मी दूर,केस्पियन सागर के पास है .उस समय किले का मालिक सुलतान मालिक शाह था.उन दिनों चारों तरफ युद्ध होते रहते थे.कभी सल्जूकी कभी फातमी आपस में लड़ते थे.इसलिए सुलतान ने किले की रक्षा के लिए अलवी खानदान के एक व्यक्ती कमरुद्दीन खुराशाह को नियुक्त कर दिया था.उनदिन किला खाली पडा था..हसन बिन सब्बाह ने किला तीन हजार दीनार में खरीद लिया.

क्योंकि हसन पहले से ही जन्नत बनाने के मूड में था ही सो इसके लिए हसन को वह किला उपयोगी लगा ,क्यों कि किला सीरिया और तेहरान के मार्ग पर था .जिसपर काफिलों से व्यापार होता था.
            यह किला एक सपाट फिसलन वाली पहाडी पर है .किले की ऊंचाई ८४० मीटर है .लेकिन वहां पानी के सोते हैं.किले की लम्बाई ४०० मीटर और चौडाई ३० मीटर है..इससे हसन ने अपने लोगों और कुछ गाँव के लोगों के साथ मिलकर काफिले वालों से टेक्स लेना शुरू करदिया. इससे हसन को काफी दौलत मिली.उसके बाद हसन ने किले में तहखाने और सुरंगें भी बनवा लीं.जब किला हराभरा हो गया तो ,हसन ने किले में एक नकली जन्नत भी बनाली.जैसा कुरआन में कहा गया है|हसन आसपास के गाँव से अपने आदमियों द्वारा सुन्दर ,और कुंवारी जवान लडकियां उठावा लेताथा. और लड़किओं को अपनी जन्नत के तहखानों में कैद कर लेता था.हसन ने इस नकली जन्नत में एक नहर भी बनवाई थी ,जिसमे हमेशा शराब बहती रहती थी.किले वह सब सामान थे जो कुरआन में जन्नत के बारे में लिखे हैं.

            फिरजब हसन के लोग आसपास के गाँव में धर्म प्रचार करने जाते तो लोगों को विश्वास में लेकर उन्हें हशीस पिलाकर बेहोश कर देते थे और जब लोग बेहोश हो जाते तो उनको उठाकर किले में ले जाते थे।उनसे कहते कि अल्लाह तुम से खुश है ,अब तुम जन्नत में रहो.लोग कुछ दिनों तक यह नादान लोग खूब अय्याशी करते और समझते थे कि वे जन्नत में हैं.फिर कुछ दिनों मौजा मस्ती करवाने के बाद लोगों दोबारा हशीश पिलाकर वापिस गाँव छोड़ दिया जाता .एक बार जन्नत का चस्का लग जाने के बाद लोग फिर से जन्नत की इच्छा करने लगते तो ,उनसे कहा जाता कि अगर फिर से जन्नत में जाना चाहते हो तो हमारा हुक्म मानो .लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते थे।ऐसे लोगों को हसिसीन कहा जाता है।मार्को पोलो ने इसका अपने विवरणों में उल्लेख किया है आज भी लोग जन्नत के लालच में निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं।

यह जन्नत बहुत समय तक बनी रही.जब हलाकू खान ने १५ दिसंबर १२५६ को इस किले पर हमला किया तो किले के सूबे दार ने बिना युद्ध के किला हलाकू के हवाले कर दिया.जब हलाकू किले के अन्दर गया तो देखा वहां सिर्फ अधनंगी औरतें ही थी.हलाकू ने उन लड़कियों से पूछा तुम कौन हो ,तो वह वह बोलीं "अना मलाकुन"यानी हम हूरें हैं.

यह किला आज भी सीरिया और ईरान की सीमा के पास है .सन २००४ के भूकंप में किले को थोडासा नुकसान हो गया |लेकिन आज बी लोग इस किले को देखने जाते हैं .और जन्नत की हकीकत समझ जाते हैं कि....  तो क्या जैसे यह जन्नत झूठी है वैसे ही कुरआन में बतायी गयी जन्नत भी झूठ  नहीं होगी?

(यह लेख पाकिस्तान से प्रकाशित पुस्तक "इस्माईली मुशाहीर "के आधार पर लिखा गया है.प्रकाशक अब्बासी -लीथो आर्ट ,लयाकत रोड -कराची)




कसाव को फाँसी या कांग्रेस की बदमासी


आज सुबह वड़े ही दिनों से ठण्डे वस्ते  में पड़ी हुयी कसाव की फाँसी अचानक सरकार को याद ही नही आयी वल्कि उसका तत्काल ही मामला 35 कर दिया गया।ताज्जुव की बात तो यह किसी के कानों कान खबर भी नही और आतंकी उर्फ सरकार का रिस्तेदार को फाँसी की सजा दे भी दी गयी ये भी तब जबकि इतने दिनों तक इंतजार हो रहा था और फाँसी जब दी गयी कि फाँसी के लिए कागजो पर हस्ताक्षर करने बाला ग्रहमंत्री भारत से सात समुन्दर पार रोम में हैं।न किसी मीडिया को खबर न दुनिया को खबर और न ही उसके केश की सुनबाई करने बाले वकील को ही कानों कान खबर हुयी और कसाब को सजा भी हो गयी दफना भी दिया गया शावाश करिश्मा करने में माहिर कांग्रेस सरकार तुम तो सचमुच हैरी पाटर से भी कई गुना बड़ी करिश्मा करने की ताकत रखती हो।क्योकि भारत की आजादी से लेकर आज तक तुमने किया ही क्या है केवल करिश्मे के सिवाय कभी भगत सिंह राजगुरु व सुखदेव को फाँसी लगवा कर कभी चन्द्रशेखर आजाद को मरवाकर कभी नेताजी की हत्या के मामले की लीपापोती करके कभी भारत के सभी क्रांतिकारियों के कारनामों को दरकिनार कर केवल कांग्रेस के पिठ्ठुओं को स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी वनाकर कभी जीप घोटाले के अभियुक्त कृष्णा मेनन को अमरीकी राजदूत बना कर कभी श्यामाप्रसाद मुखर्जी की हत्या करवा कर कभी दीन दयाल उपाध्याय को रेल के अन्दर मरबा कर कभी लंका के खिलाफ एल.टी.टी.ई पैदा कर फिर उसी के खिलाफ शान्ति सेना भेजकर कभी भिंडरावाले को अपने राजनैतिक लाभ के लिए सहयोग करके फिर जब वह बागी हुआ तो उससे बदला लेने के लिए बूट पहने सैनिकों को स्वर्ण मंदिर में पहुँचा कर खालिस्तानियों के मंसूवो को आगे बढ़ा कर कभी फिर इन्दिरा की हत्या का बहाना कर सारे सिख समाज पर 1984 में दंगे कराकर हिन्दु समाज व सिख समाज की दोस्ती में आग लगाकर और न जाने कितने जाने अनजाने मामलों में कोई न कोई करिश्मा करके तुमने भारत की जो रैड़ ली है सचमुच तुम हमेशा भारतीयों के दिलों की गहराईयों में घृणा की गहनतम गहराईयों तक उतर गई हो ।है कांग्रेस तुम्हारे भारत की रेड़ लेने में बहुत उपकार हैं।
लैकिन हमने तो आज पोस्ट जो दी है  उसका मकसद है यह पता लगाना कि
कसाब की डेंगू से भई  मौत या मिली वास्तविक फाँसी
सुन सुन मोकू  आवे हांसी
कल तक याकू रोटी खवाई कैसे दई होवेगी सोनिया मैया ने वेटा कू फाँसी 
मोय आवे सुन सुन हाँसी 
यह है पक्की कांग्रेसी बदमासी
कसाब को फाशी हुई भी या सोनिया ने उसको छुपा दिया है .....कुछ तो गडबड है नही तो एकदम से फासी ...???? हमको तो विश्वास हो नही रहा है भाइयो ...!!!
कसाब को फांसी तो दे दी गयी लेकिन कुछ सवाल :-, 1. क्या कसाब की मौत डेंगू से हो चुकी थी ?, 2. ये फांसी का कार्यक्रम अचानक कैसे बना ??, 3. गुजरात चुनाव के लिए प्रलोभन तो नहीं कहीं ये ?, 4. मीडिया लगातार कांग्रेस की तारीफ कर रही है, ठीक चुनाव से पहले ये कदम कहीं वोट बैंक की राजनीति तो नहीं ??, खैर सवाल कई हैं, जवाब भी हम सोशल मीडिया वाले खोज ही लेंगे, पर फिलहाल इसी बात की ख़ुशी है की देश के गुनाहगार को फांसी दे दी गयी है,क्या अब अफजल गुरु की बाकी है?
कई चीजे हैं जो मुझे बहुत कुछ सोचने को मजबूर करती हैं और शायद मैं गलत नही कह रहा ���ूँ सोच तो आप भी रहै होंगे  बहुत सी बातें हैं ,,जैसे कि कही कसाब डेंगू से तो नही मरा ? सद्दाम हुसैन का अंतिम वीडियो तक जारी हुआ मगर कसाब का नही ? यहाँ तक की पुणे स्थित जिस यरवडा जेल में उसे दो दिन पूर्व शिफ्ट किया गया ,वहाँ उसे दफना भी दिया गया और उसकी झलक भी नही दिखाई गयी ....
अब राम जाने कि फाँसी हुयी हैं,,या डेंगू से मरा हैं ? या कही ऐसा तो नही कि कसाब को रातोंरात पाकिस्तान ही भेज दिया गया हो ? क्योकि जो कांग्रेस भगतसिंह ,, राजगुरु और सुख देव की मृत्यु फाँसी से बता सकती हैं,,उन्हें क्रांतिकारी ना मानकर आतंकी मानती हो और नेहरु जैसे कामुकता की प्रतिमूर्ति  महानुभावों  को हमेशा अपना  आदर्श मानती हो ,, बाबर ,,औरंगजेब ,,अकबर इत्यादि आक्रान्ताो  के नाम पर आज भी दिल्ली की सड़कें हों ? ऐसी नीच सरकार की एक एक घोषणा पर मुझे संदेह प्रकट होता हैं....
कही यह नौटंकी चुनाव के मद्देनजर तो नही की गई ? क्योंकि ग्रहमंत्री सुशिल कुमार शिंदे खुद  महाराष्ट्र से हैं,,जहाँ चुनाव होने हैं और कांग्रेस कसाब के जरिये अपना उल्लू सीधा कर रही हो ? या कही कल से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र को देखते हुए इसे नाटकीय ढंग से प्रस्तुत किया गया हो ? आखिर क्या वजह रही कि पहले यही सरकार कहती थी कि अभी कसाब को फाँसी मुमकिन नही क्योकि फाँसी कतार से दी जाती हैं और अभी कसाब से पहले भी कई विचाराधीन मुलजिम हैं,,जिन्हें फाँसी मिलनी बाकी हैं,,,अफजल गुरु को अभी तक फाँसी नही हुयी ,,फिर अचानक कसाब को आज सुबह ०७:३६ पर कैसे चुपचाप फाँसी दे दी गयी ?कहीं शिव सेना प्रमुख ठाकरे की लोक प्रियता देख कर कांग्रस घवड़ा गई हो और उसे अपना अन्त विल्कुल निकट आता दिखाई दे रहा हो तो इस  आतंक बादी जो कि डेंगू के कारण मर ही गया था उसे मरे मराए को फाँ सी लगबा कर इसकी खाल से कीमत बसूल रही है हिन्दुऔ को वेवकूफ बनाकर हिन्दु धर्मबादी पार्टियों की लोकप्रियता से घवड़ाकर 
लैकिन बहुत से सवाल हैं जो आज दिनाक २१-११-२०१२ के गर्भ में छुपे हुए हैं.. २६-११ -२००९ को हुए हमले का अंतिम चश्मदीद अजमल कसाब भले ही आज फिर घटना की तारीख से पांच दिन पहले सुर्खियों में छा गया हो मगर मुझे बहुत कुछ एसा दिखाई दे रहा हैं जो धुंधला धुंधला दिखाई दे रहा हैं,,वक्त की धूल और समय के कोहरे को साफ़ होने दीजिए ,,हकीकत सामने फिर आएगी ,,,अगर कसाब को फाँसी देनी ही थी तो पांच दिन बाद २६-११ की बरसी पर क्यों नही दी गयी ?
 खैर ,,कहीं यह सारा प्रपंच चुनाव के मद्देनजर  या कल से शुरू होने शीतकालीन सत्र के मद्देनजर तो नही हैं ,, या ममता के अविश्वास प्रस्ताव की आंच से बचने के लिए हैं,,इस सवाल का जवाब वक्त पर ही छोडना मुनासिब होगा ...तब तक आप भी सोचिये कि पहले कतार से फाँसी देने की बात कहने वाली सरकार अब एकदम से कैसे पलट गयी ? क्यों नही उसकी कोई भी वीडियो फुटेज प्रसारित की गयी ? सवाल बहुत हैं मगर जवाब नही 
कृपया भारत की गरीव व शिक्षित जनता इस पर विचार करे क्यों कि हो सकता है कि आतंकी तो पंहुचा दिया हो पाकिस्तान औऱ गाना गाया जा रहा हो भारत में 
और नही तो जिसको जेल में रोटियाँ खुद सोनिया जी ने खिलाई हों ।उसे अचानक फाँसी लग जाऐ यह कठिन अवश्य है तो कांग्रेस के लिए एसा क्यों होता है कि कांग्रेस खुद ही आजादी व उससे पहले से ही क्यों शक के घेरे में आ जाती है।

Wednesday, November 21, 2012

जब नेहरु द्वारा एक केबिनेट मीटिंग के दौरान सरदार पटेल को अपमानित और लांछित किया गया

सरदार पटेल एक एसा नाम जो भारत के प्रत्येक व्यक्ति के लिए कोई अनजाना नाम नही है।भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का वह नाम जो किसानो का नेता के नाम से जाना जाता हो।भारत जिसे लौह पुरुष के नाम से जानता है।
” जिस व्यक्ति ने लार्ड माउण्टवेटेन,वी.पी. मेनन के साथ मिलकर  90 वर्ष के ब्रिटिश राज, मुगल शासन के 180 वर्षों या अशोक अथवा मौर्या शासकों के 130 वर्षों की तुलना में ज्यादा विशाल एवं  संगठित भारत हासिल किया।”
हम इन तीनों लोगों के समूह  की उपलब्धि को  आदरांजलि समर्पित करते हैं।
ऑलेक्स फॉन टुनेसलेमान नामक  जर्मन महिला ने जो अर्थपूर्ण ढंग से लिखा है उसकी पुष्टि वी.पी. मेनन द्वारा दि स्टोरी ऑफ इंटीगिरेशन ऑफ दि इण्डियन स्टेट्स‘ के 612 पृष्ठों में तथ्यों और आंकड़ों से इस प्रकार की है।

”564 भारतीय राज्य पांचवा हिस्सा या लगभग आधा देश बनाते हैं: कुछ बड़े स्टेट्स थे, कुछ केवल जागीरें। जब भारत का विभाजन हुआ और पाकिस्तान एक पृथक देश बना तब भारत का 364, 737 वर्ग मील और 81.5 मिलियन जनसंख्या से हाथ धोना पड़ा लेकिन स्टेट्स का भारत में एकीकरण होने से भारत को लगभग 500,000 वर्ग मील और 86.5 मिलियन जनसंख्या जुड़ी जिससे, भारत की पर्याप्त क्षतिपूर्ति हुई।”

स्टेट्स के एकीकरण सम्बंधी अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में वी.पी. मेनन लिखते हैं: यह पुस्तक स्वर्गीय सरदार वल्लभभाई पटेल को किए गए वायदे की आंशिक पूर्ति है। यह उनकी तीव्र इच्छा थी कि मैं दो पुस्तकें लिखूं, जिसमें से एक में उन घटनाओं का वर्णन हो जिनके चलते सत्ता का हस्तांतरण हुआ और दूसरी भारतीय स्टेट्स के एकीकरण से सम्बन्धित हो।
30 अक्टूबर, 2012 को सरदार पटेल की जयंती की पूर्व संध्या पर ‘पायनियर‘ ने एक समाचार प्रकाशित किया कि कैसे प्रधानमंत्री नेहरु हैदराबाद की मुक्ति के सरदार की योजना को असफल करना चाहते थे।
समाचार इस प्रकार है:

”तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और भारत के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल जिनकी 137वीं जयंती 31 अक्टूबर को है, को तब के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरु द्वारा एक केबिनेट मीटिंग के दौरान अपमानित और लांछित किया गया। ”आप एक पूर्णतया साम्प्रदायिक हो और मैं तुम्हारे सुझावों और प्रस्तावों के साथ कभी पार्टी नहीं बन सकता”-नेहरु एक महत्वपूर्ण केबिनेट बैठक में सरदार पटेल पर चिल्लाए जिसमें निजाम की निजी सेना-रजाकारों के चंगुल से, सेना की कार्रवाई से हैदराबाद की मुक्ति पर विचार हो रहा था।

हतप्रभ सरदार पटेल ने मेज पर से अपने पेपर इक्ट्ठे किए और धीरे-धीरे चलते हुऐ कैबिनेट कक्ष से बाहर चले गए। यह अंतिम अवसर था जब पटेल ने कैबिनेट बैठक में भाग लिया। 1947 बैच के आईएस अधिकारी एम के नायर ने अपने संस्मरण ”विद नो इल फीलिंग टू एनीबॉडी” में लिखा है कि ”उन्होंने तब से नेहरु से बोलना भी बंद कर दिया।”

हालांकि नायर ने उपरोक्त वर्णित कैबिनेट बैठक की सही तिथि नहीं लिखी है, परन्तु यह हैदराबाद मुक्ति के लिए चलाए गए भारतीय सेना के अभियान ऑपरेशन पोलो, जो 13 सितम्बर, 1948 को शुरु होकर 18 सितम्बर को समाप्त हुआ, के पूर्ववर्ती सप्ताहों में हुई होगी।

जबकि सरदार पटेल 2,00,000 रजाकारों के बलात्कार और उत्पात से हैदराबाद को मुक्त कराने के लिए सेना की सीधी कार्रवाई चाहते थे, उधर नेहरु संयुक्त राष्ट्र के विकल्प को प्राथमिकता दे रहे थे।

नायर लिखते हैं कि सरदार पटेल के प्रति नेहरु की निजी घृणा 15 सितम्बर, 1950 को उस दिन और खुलकर सामने आई जिस दिन सरदार ने बॉम्बे (अब मुंबई) में अंतिम सांस ली। ”सरदार पटेल की मृत्यु का समाचार पाने के तुरंत बाद नेहरु ने राज्यों के मंत्रालय को दो नोट भेजे, इनमें से एक में नेहरु ने मेनन को लिखा कि सरदार पटेल द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली के कडिल्लक(Cadillac) कार को उनके कार्यालय को वापस भेज दिया जाए। दूसरा नोट क्षुब्ध कर देने वाला था। नेहरु चाहते थे कि सरकार के जो सचिव सरदार पटेल की अंतिम क्रिया में भाग लेने के इच्छुक थे, वे अपने निजी खर्चे पर ही जाएं।

”लेकिन मेनन ने सभी सचिवों की बैठक बुलाई और जो अंतिम क्रिया में जाना चाहते थे, की सूची मांगी। नेहरु द्वारा भेजे गए ‘नोट‘ का उन्होंने कोई उल्लेख नहीं किया। जिन लोगों ने सरदार की अंतिम यात्रा में जाने की इच्छा व्यक्त की थी उनके हवाई यात्रा के टिकट का पूरा खर्चा मेनन ने चुकाया।”

लालकृष्ण आडवाणी
नई दिल्ली

7नव.2012

Sunday, November 18, 2012

हिन्दु हृदय सम्राट बाला सहाव ठाकरे का इस राष्ट्र को अनुपम योगदान

हिन्दु हृदय सम्राट बाला साहेव ठाकरे 
हिन्दुत्व के महानायक,भारतीयता के प्रतीक,परम राष्ट्रवादी चिन्तक ही नही परम क्रान्तिकारी भी  साथ ही आधुनिक समय में शायद शिवा जी महाराज उनकी आत्मा में विराजमान थे ।ऐसे महान पुरुष बाला साहेव ठाकरे को मैं सम्पूर्ण हिन्दु समाज की और से अश्रुपूरित श्रद्धाञ्जली का अर्पण करता हूँ।भगवान उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे।
बाला साहेव ठाकरे एक ऐसा नाम है जिसे भारत का प्रत्येक व्यक्ति चाहैं अनपढ़ ही क्यों न हो अवश्य ही जानता है।हो सकता है आप उनके विचारों से सहमत हो या न हो किन्तु यह निश्चित ही है कि आप उन्हैं भूल नही सकते एसे महामानव थे बालासाहेव ठाकरे।
बाल ठाकरे महाराष्ट्र वासियों के दिलों में तो राज करते ही थे क्योंकि यही वह शख्स था जिसने मुम्वई या महाराष्ट्र वासियों के दुखः दर्द को अपने दिल में महसूस किया और उनकी रोटी की तरफ निगाह करने बाले किसी भी प्रान्त वासी को खुले तौर पर कहा कि अपने अपने राज्य में जाकर खुद का विकास करो और महाराष्ट्र की जनता को उसके संसाधनो का उपयोग करने दो वैसे हो सकता है कोई उनकी इस बात से सहमत हो या न हो किन्तु इतना तय है कि उन्हौने पूरे देश के लोगो को अपनी इस  उग्रवाणी से चेताया जरुर था कि अपने राज्य का विकास ही आपका विकास है।हाँ हो सकता है कि यह वात कुछ लोगो को राष्ट्रवाद के विरोध में लगती दिखाई दे लैकिन आप अपने घर की उन्नति करे एसा कहना मैरी नजर में भी गलत नही है।आपके घर का विकास ही आपके बच्चों को समृद्ध बनाता है।उन्हौने लुंगी हटाऔ पुंगी बजाओं का नारा दिया हो या यह कहा हो कि विहारी मेहनती होते है तो अपने यहाँ जाकर महेनत करे यह सब उन्हौने इसी लिए कहा कि महाराष्ट्र के साधन पर तो महाराष्ट्र के लोगों का ही हक है हम उनका बँटवारा नही कर सकते औऱ एक वड़े के नाते यह राय भी अप्रत्यक्ष रुप में दी कि लालू जब तुम्हारे राज्य को बरवाद कर रहा है तो क्यों उसे हटाकर अच्छा नेता लाने का प्रयास करते जिससे आपको कहीं बाहर मजदूरी करने न जाना पड़े।यह विल्कुल स्वदेशी अपनाओ वाला महात्मा गाँधी व संघ का सिद्धान्त ही था जो उन्हौने थोड़े उग्र रुप में प्रयोग किया था।
अपने समय के वेवाक विचारकों में रहे बाला साहेब हमेशा राजनेताओं को उनके राष्ट्रद्रोही कार्यों के लिए फटकारते रहै।लैकिन बाह री भारत की सत्ता  व भारत के संविधान जिसने उन्है भी न छोड़ा और उन पर अपनी वेवाकी के लिए मताधिकार व प्रतिनिधि बनने का अधिकार छीन लिया लैकिन वे कौन सा कभी प्रधान मंत्री या राष्ट्रपति वनने की इच्छा दिल में संजोये थे वे तो वैसे ही भारत की अधिकांश जनता के दिल पर राज करते थे ।उन्हैं कोई जरुरत भी नही थी कि वे मुख्यमंत्री ,प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति वनते।उन्हौने समाज सुधार का वह कार्य चुटकियों में कर डाला जिसे करने में सत्ता सम्पन्न भारत का मुख्मंत्री ,प्रधान मंत्री व राष्ट्रपति जैसे पदों पर बैठे लोग नही कर पा रहै तो फिर प्रशाशनिक अधिकारियों की तो विसात ही क्या है।उन्हौने मुम्वई का आतंक का पर्याय बन चुके मुम्बईया अन्डर वर्ल्ड का एसा प्रतिकार किया जिसका प्रतिकार करने के लिए स्वतंत्र भारत की कोई भी सरकार साहस भी नही कर पा रही थी।और यह वह शेर था जिसके कारण कलाकारों, उद्यमियों, व्यापारियों,और दूसरे अन्य सम्पन्न तवकों से चौथ वसूली करने बाले अपने अपने विलों में घुस गये थे।और बालासाहेव ने  स्वंय को सभ्य समाज के लिए समृद्धि ,शान्ति,सुरक्षा व संरक्षा के पर्याय के एसे पद पर प्रतिष्ठित करा दिया कि लोग उनके सैनिकों को  वर्दी वालों से अधिक सम्मान देने लगे।और उनमें स्वयं ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ही नही  भारत के प्रधानमंत्री व ऱाष्ट्रपति से भी वड़ी शक्तियाँ परिलक्षित होने लगीं।उनमें आज के दौर में भी कहीं लालच रंचमात्र भी दिखाई नही दिया ।और यही कुछ कारण थे जिसके कारण मुम्वई की 24 घण्टे रफ्तार भरी जिन्दगी जो कि दूना काम करने की ताकत रखती है को भी बाला सहाव का केवल एक आह्वान बंद कर सकने की शक्ति रखता था।नही तो मुम्वई की रफ्तार न तो सीरियल बम ब्लास्ट से रुक सकी थी और न ही किसी भी नरसंहार से लैकिन बाला सहाव ही वो शख्स थे जिनमें वह अदम्य साहस था कि मुम्बई की रफ्तार को पलक झपकते ही रोक दें।
बाल ठाकरे दुनिया के अन्दर भी यह ताकत रखते थे जो ताकत दिल्ली नही रखती।दिल्ली की बात को कभी पाकिस्तान या आतंकबादियों ने नही माना व समझा जबकि वह एक एसा शेर था जिसके कारण आतंक के साम्राज्य बादियों का भी दिल धड़धडा़ कर टूटने को हो जाता था।सन् 1992-1993 मेँ कश्मीरी आतंकवादी कठमुल्लोँ ने फतवा दिया था कि, अगर अमरनाथ यात्रा जारी रखी गई तो प्रत्येक यात्री को बम से उड़ा दिया जाएगा, और तत्कालीन खान्ग्रेस सरकार वहाँ तैनात 13 लाख सैनिकोँ की जान दाँव पे लगाकर छिप गई  थी, तब बाल ठाकरे ने कहा था कि मुल्लोँ लगाओ अमरनाथ यात्रा पर रोक, मैँ देखता हूँ कि कैसे कोई
कठमुल्ला हज जाने के लिए बंबई(मुंबई) तकआता है, इस बात का एसा असर हुआ कि  आज तक अमरनाथ यात्रा जारी है।उसी प्रकार बाला सहाव का यह बयान भी काविले तारीफ है कि मुझे सेना दे दो में भारत की सभी समस्याओं का अन्त कर दूँगा

आज के युग  में जवकि प्रत्येक नेता केवल कुर्सी के लालच में हिन्दुत्व का अपमान करने पर तुला है यह एसे सिंह थे जिन्हौने कभी बोटों के लालच में भारतीयता का विरोध नही किया और उनके रहते कोई भी इस बात का साहस भी न जुटा सका अतः वह सच्चे शब्दों मे हिन्दु हृदय सम्राट  ही थे।उन्हौने कभी किसी प्रकार का लालच नही दिखाया जो भी किया डंके की चोट पर किया।किसी भी सरकारी पद पर न होते हुये भी सभी लोगों विरोधियों व पक्षधरों सभी की श्रद्धा़ञ्जलि पाना उनकी उसी ताकत का परिणाम है।विरोधी मुसलमानों की श्रद्धाञ्जलि का अर्पण कैवल और केवल शिव सेना की ताकत का ही प्रमाण है जो ताकत उन्हौने अपने संपूर्ण जीवन को लगाकर प्राप्त की थी।अब उद्धव ठाकरे जी को वह ताकत प्राप्त करने के लिए अपने पिता के पद चिन्हों पर ही चलना होगा वैसे इस सख्सियत ने केवल उद्धव को ही नही अनेकों युवाओ को एसा मकसद प्रदान किया है जो कभी वीर शिवा ने मराठों को प्रदान किया था।वास्तव में एक एसे सेना पति का कथन था जिसने प्रत्येक वयान पर कैवल बौलना नही सीखा था अपितु प्रयोग भी किया था।आज जवकि वे हमारे साथ नही हैं हमारे भारत के लिए यह एक अपूरणीय क्षति है। हमने एक एक सिंह सेनापति खो दिया है।जो हमारे दिलों में हमेशा रहैगा प्रभु उन्हैं वह स्थान प्रदान करे जो उसने वीर शिवा ,महाराणा प्रताप ,गुरु गोविन्द सिंह , आदि को प्रदान किया है।


Saturday, November 10, 2012

ईसाई धर्म के ढोंग की पोल खुली।

कहते हैं ईसा मसीह ने कभी शादी नही की अर्थात हमेशा अविवाहित रहै।इसी बात को कहकर हमेशा से स्त्रियों को प्रताड़ित करते रहै ये ईसाई स्त्रियों को कभी वपतिस्मा देकर तो कभी ठुडडी लगाकर प्रताड़ित करते रहै हैं किन्तु अब आकर पोल खुली है कि ईसा मसीह तो विवाहित थे।अब कहो कि जितनी औरतों को इन औरतों पर अत्याचार किये है उसके लिए क्या ये दण्डित होना पसन्द करेगे ये पोप जो पाखण्डों का सूत्रधार है ने हमेशा कोई न कोई पोप लीला ही की है कभी यहूदियों का नरसंहार कराकर तो कभी यूरोप की सत्ता का केन्द्र वनकर

यह खवर हमारी बनाय़ी हुयी नही वल्कि  देनिक जागरण की है।
Coptic Scholars Doubt and Hail a Reference to Jesus' Wife

भोजपत्र में मिले ईसा मसीह के शादीशुदा होने के सुबूत


लंदन। ईसाई इतिहास के जानकारों ने दावा किया है कि एक प्राचीन भोजपत्र पर ईसा मसीह के शादीशुदा होने का स्पष्ट विवरण मौजूद है। इस भोजपत्र का आकार बहुत छोटा है और इसमें काली स्याही से लिखी हुई आठ पंक्तियां हैं, जिन्हें लेंस की मदद से देखा जा सकता है।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर केरेन किंग ने चौथी शताब्दी के इस भोजपत्र को रोम में आयोजित एक छह दिवसीय सम्मेलन में पेश किया। यह भोजपत्र कूड़े के ढेर में मिला था। केरेन ने बताया कि शोधकर्ताओं ने उन शब्दों को पहचान लिया है, जिसमें ईसा मसीह अपनी पत्नी का जिक्र करते हैं। उनके मुताबिक हो सकता है यह मेरी मैग्डेलन हों।
ईसाई मान्यताओं के मुताबिक ईसा मसीह अविवाहित थे, लेकिन केरेन किंग का कहना है कि बहुत पहले से यह बहस का मुद्दा है। उनका कहना था कि इस शोध से ईसा मसीह के ब्रह्मचर्य और ईसाइयत में महिलाओं की भूमिका को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। सम्मेलन में कई ऐसे सवाल उठाए गए, जिनका जवाब नहीं दिया जा सका है। केरेन किंग का कहना था कि यह भोजपत्र ऐसा पहला धर्मलेख है, जिसमें ईसा मसीह अपनी पत्नी को संबोधित कर रहे हैं। उनके मुताबिक चौथी शताब्दी का यह दस्तावेज मूल रूप से दूसरी शताब्दी में ग्रीक भाषा में लिखा गया था। दूसरी ओर केंटकी में प्रोफेसर और बाइबल के विद्वान बेन विदरिंगटन कहते हैं कि हो सकता है कि वाइफ शब्द का इस्तेमाल किसी घरेलू नौकरानी या किसी अनुयायी के लिए किया गया हो। केरेन के सहयोगी शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह अपने अनुयायियों से यह भी कहते हैं कि मेरी मैगेडेलेन को शिष्या बनाना फायदेमंद होगा। इससे यह पुरानी धारणा भी खारिज होती है कि ईसा मसीह की कोई महिला शिष्य नहीं थी।
Web Title: Coptic Scholars Doubt and Hail a Reference to Jesus' Wife
(Hindi news from Dainik Jagran, miscellaneous Desk)

यहूदियों पर कितना अत्याचार किया है इन सेवा भावी ईसाईयों ने

भूत काल के समय का सत्य जब वर्तमान की दहलीजों को पार करता हुआ भविष्य तक आता है तो इस वर्तमान के लिए यही सत्य इतिहास कहा जाता है। औऱ कोई कितना भी क्यों न झुपाना चाहै किन्तु यह सत्य कभी न कभी जरुर प्रकट हो जाता है।और यह धोके बाजी खुल जाती है।
ईसाईयत दुनिया में एक ऐसी सभ्यता है जिसने अपने पैदा होने के लिए जाने कितने ढोंग खड़े किये हैं।अपने पैदा होने के लिए ईसाईयत ने अपने पैत्रक धर्म यहूदियों पर अत्याचारों की झड़ी लगा दी और तब चैन लिया जब उन्हैं नेस्तनाबूद कर दिया।इतिहास यह तो जानता ही है कि ईसाईयों रोम के पोप के इशारे पर जर्मनी के तानाशाह ने 60 लाख यहूदियों को ग्रेफाइट की सुरंगो में सरका सरका कर मार डाला था और दया का धर्म कहे जाने बाले इस ईसाई धर्म ने आह तक न निकाली निकलती भी कहाँ से जवकि ईसाई सरगना पोप के इसारे पर जवकि यह कत्लेआम हो रहा था।लैकिन इन यहूदियों की जिजीविशा के क्या कहने। जब उन्हैं कहीं किसी भी राष्ट्र में पनाह न मिली तो आ गये सम्पूर्ण संसार की शरणस्थली भारत जहाँ वेचारों को शरण मिल पाय़ी और यहीं से उन्हौने अपने आपको संगठित किया तथा याद रखा इस संबोधन के साथ कि कहाँ मिलोगे -येरुशलम औऱ 1948 में अपने देश को पुनः प्राप्त कर लिया।
चलते -2 यह भी बताता चलूं कि हजरत मूसा ने प्राचीन मिश्र देश से सिनाई के मरुस्थल को पार करके अपने अनुयायियो के साथ पैलेस्टाइन को आ गये तथा यहाँ येरुशलम को केन्द्र बनाकर अपने पंथ का प्रचार प्रसार करते हुये उस क्षेत्र को एक देश के या एक राष्ट्र में स्थापित किया।बाईबिल का पूर्वार्ध भाग जिसे ईसाई ओल्डटेस्टामेंट कहते हैं यहूदी इसे तौरत कहते हैं।यह यहूदियों का प्रमुख धार्मिक ग्रथ है।जिसके धार्मिक स्थलों को आज भी टेम्पल या मंदिर के नाम से जाना जाता है।जिसका एक मात्र ध्वंसावशेष वेलिंग वाल को इन दुष्ट ईसाईयों ने यहूदियों को अपमानित करने के लिए उसी तरीके से विना तोड़े छोड़ दिया था जैसे कि नालायक औरंगजैव ने विक्रमादित्य के बनवाऐ हुये विश्वनाथ मंदिर को हिन्दुओं को अपमानित करने की दृष्टि से विना तोड़े छोड़ दिया था।यहूदियों व पारसियों ने कभी भी हिंदुओं की तरह ही अपने धर्म को तलवार के बल पर नही फैलाया है।और इसी बात की सजा ये तीनों धर्म आज भी झेल रहैं हैं।और तो और ये तीनो धर्म
लगातार इन दुष्टों के दुश्प्रचार का भी लक्ष्य रहै हैं।नीरो नामक श्रेष्ठ राजा को बदनाम करना तथा शेक्श पीयर द्वारा शाईलाक नाम का काल्पनिक पात्र यहूदी धर्म से संबधित रखकर बास्तव में यहूदियों को बदनाम करने की ही साजिस के तहत किये गये कुछ उदाहरण मात्र हैं। लैकिन इतना सब झेलने के बावजूद भी यह तीनो समाज आज तक अपने को बचाए रख पाये है। यह इनकी जिजीविशा का ही परिणाम है। लैकिन ध्यान रखने की बात यह भी है कि दुनियाँ ने चाहै इन यहूदियों व पारसियों के साथ अत्याचार के पृष्ठ पर पृष्ठ क्यों न लिख दिये हों किन्तु भारत के अतिरिक्त इनको हर जगह अपमान का ही घूँट पीना पड़ा है।यहूदियों के अपमान की गाथा मे शाईलाक नामक पात्र द्वारा माँगा गया 1 पांड गोस्त एक मुहावरे के रुप में पाउण्ड आफ फ्लेश के नाम से फेमस करके यहूदियों के प्रति ईसाईयत की घृणा को ही प्रकट करता है।लैकिन येरुशलम में फिर मिलेगें के वाक्य द्वारा परस्पर विदा होते यहूदियों ने अपने येरुशलम को नही विसरित किया।इसके परिणाम स्वरुप उन लोगों को अपनी मात्रभूमि लगभग 2000 वर्षों  वाद प्राप्त हो ही गयी।उन्हौने अपने खण्डित राष्ट्र अखण्ड तो बना ही लिया साथ ही अपनी सीमायें भी प्राप्त कर लीं।
धर्म की दृढ़ता पूर्वक रक्षा से गँवाया हुआ राष्ट्र कैसे दोबारा प्राप्त किया जाए इसका ज्वलन्त प्रमाण आज के समय में इजराइल है।
              लैकिन ध्यान दैने की सवसे प्रमुख बात यह है कि यह मूसा कौन थे मूसा थे मिश्र देश के निवासी और इस मिश्र के प्राचीन 11 सम्राटों के नाम के साथ राम का नाम जुड़ा है।औऱ दुनिया यह भी जानती ही कि राम के नाम से जो है वे सब हिन्दु ही तो हैं।